दीपक प्रकाश बोले- अब मैं MLC हूं, स्थिति बदल गई; सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई, जानिए पूरा मामला
नवंबर 2025 में पहली बार मंत्री बने थे दीपक प्रकाश
मामला नवंबर 2025 से शुरू होता है. 20 नवंबर 2025 को नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री बनाया गया था. उस समय वह बिहार विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे.
संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई व्यक्ति विधायक या विधान पार्षद नहीं होने के बावजूद मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन उसे छह महीने के भीतर राज्य विधानमंडल का सदस्य बनना होता है. अगर वह छह महीने के भीतर सदस्य नहीं बनता है तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है.
सरकार बदली तो 7 मई को फिर मंत्री बने
15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के साथ मंत्रिपरिषद भी समाप्त हो गई. इसके बाद 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनी और दीपक प्रकाश को एक बार फिर पंचायती राज मंत्री बनाया गया.
यहीं से विवाद शुरू हुआ. याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में इस दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी. याचिका में सवाल उठाया गया कि क्या बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने किसी व्यक्ति को छह महीने की संवैधानिक अवधि पूरी होने के बाद नए मुख्यमंत्री की सरकार में फिर से मंत्री बनाया जा सकता है.
15 जून को सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
राकेश कुमार सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 15 जून 2026 को बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया. याचिका में उनकी दोबारा नियुक्ति को असंवैधानिक बताते हुए मंत्री पद से हटाने की मांग की गई थी.
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि संविधान में गैर-विधायक मंत्री के लिए छह महीने की जो व्यवस्था है, उसका इस्तेमाल बार-बार मंत्री पद पर बने रहने के लिए नहीं किया जा सकता.
30 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था सवाल
30 जुलाई को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से कड़ा सवाल पूछा था कि जब दीपक प्रकाश निर्वाचित सदस्य नहीं हैं तो छह महीने से अधिक समय तक उन्हें मंत्री के रूप में कैसे रखा जा रहा है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले को कानून का गंभीर सवाल बताते हुए सरकार से संवैधानिक आधार स्पष्ट करने को कहा था. इसके बाद मामले की सुनवाई को प्राथमिकता दी गई.
इसके बाद दीपक प्रकाश को बनाया गया MLC
सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति के बाद बिहार में दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने की प्रक्रिया शुरू हुई. बीजेपी एमएलसी देवेश कुमार के इस्तीफे के बाद विधान परिषद की सीट खाली हुई और दीपक प्रकाश को उस सीट से विधान परिषद का सदस्य बनाया गया.
अगस्त में बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दीपक प्रकाश अब विधान परिषद के सदस्य बन चुके हैं और उन्होंने एमएलसी के रूप में शपथ भी ले ली है. सरकार का कहना था कि इस बदलाव के बाद उन्हें मंत्री पद पर बने रहने से रोकने का आधार समाप्त हो गया है.
सरकार ने कहा- अब संवैधानिक स्थिति बदल गई
7 अगस्त की सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य नामित किया जा चुका है. सरकार के अनुसार अब वह विधानमंडल के सदस्य हैं, इसलिए मंत्री पद पर बने रहने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से संबंधित नामांकन अधिसूचना पेश करने को कहा था.
दीपक प्रकाश ने हलफनामे में क्या कहा
अब दीपक प्रकाश की ओर से दाखिल हलफनामे में मुख्य आधार यही है कि मामले की मौजूदा स्थिति पहले जैसी नहीं रही. जिस समय याचिका दायर की गई थी, उस समय वह विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे. अब वह एमएलसी बन चुके हैं.
इसी आधार पर याचिका को निरर्थक बताते हुए इसे खारिज करने की मांग की गई है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल संवैधानिक सवाल यह भी बना हुआ है कि पहली नियुक्ति और बाद में दोबारा मंत्री बनाए जाने के बीच अनुच्छेद 164(4) की छह महीने की सीमा को किस तरह देखा जाए.
आज की सुनवाई में क्या तय होगा
आज की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने दो अहम पहलू रहेंगे. पहला, एमएलसी बनने के बाद दीपक प्रकाश की मौजूदा स्थिति. दूसरा, क्या उनकी 7 मई की दोबारा नियुक्ति को लेकर उठाया गया संवैधानिक सवाल केवल एमएलसी बनने के बाद खत्म हो जाता है या अदालत को इस पर अलग से फैसला करना होगा.
उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में आज की सुनवाई का अंतिम आदेश अभी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है. इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है या दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति को अंतिम रूप से वैध ठहरा दिया है.
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